Tuesday, August 20, 2024

चन्दन सा बदन चंचल चितवन

 

चन्दन सा बदन चंचल चितवन 


चन्दन सा बदन…चंचल चितवन…धीरे से तेरा ये मुस्काना…  मुझे दोष न देना जग वालों हो जाऊँ अगर मैं दीवाना !!!  कवि ने  कितनी सौम्यता और ख़ूबसूरती से महबूबा की तारीफ़ की है।  असल में हर नर के दिल में आपनी महबूबा के लिए भाव होते हैं परन्तु शायर लोग ही ब्यान कर कर पाते हैं इसको इतनी खूबसूरती से। नारी प्रकृति की सर्वश्रेठ कृति है।  नारी ही माँ बनती है।   नवजात शिशु को चाहिए कोमल स्पर्श और प्यार।  भगवान् ने नारी  में कोमलता और ममतामई स्नेह के गुण  कूट कूट कर इस लिए भरे हैं ताकि बच्चे को उस का स्नेह और कोमलता प्राप्त हो। माँ बनने का अवसर तो जब आता है तब आता है परन्तु नारी की कोमलता और स्नेह पर पुरुष लट्टू हुआ रहता है और उस की उपमा करने में पुरुष कभी तो चित्रकार बनकर  चित्र बनाता है, कभी शिल्पकार बन जाता  है और कभी  कवि बन कर कविता लिख देता है और कभी प्रेमी बन कर गीत गाता रहता है।  हर देश और काल में ऐसा होता आया है।  गीतकार गुनगुनाता रहता  है: महबूबा तेरी तस्वीर किस तरह से बनाऊँ।   कुछ लोकप्रिय गीत जिन से मैं परिचित हूँ उनके बोल और भाव इस प्रकार हैं:   


  • चन्दन सा बदन चंचल चितवन धीरे से तेरा ये मुस्काना। मुझे दोष न देना जग वालों, हो जाऊँ अगर मैं दीवाना।  ये काम कमान भँवे तेरी; पलकों के किनारे कजरारे; माथे पर सिंदूरी सूरज; होंठों पे दहकते अंगारे।  साया भी जो तेरा पड़ जाए आबाद हो दिल का वीराना। तन भी सुंदर, मन भी सुंदर; तू सुंदरता की मूरत है।  किसी और को शायद कम होगी मुझे तेरी बहुत ज़रूरत है।  पहले भी बहुत मैं तरसा हूँ  तू और न मुझको तरसाना।  चन्दन सा बदन चंचल चितवन। गीतकार: इंदीवर; फिल्म:सरस्वती चंद्र (1968); गायक: मुकेश 

  • चौदहवीं का चाँद हो या आफ़ताब हो (आफ़ताब =सूरज); जो भी हो तुम ख़ुदा की क़सम लाजवाब हो।  ज़ुल्फ़ें हैं जैसे कांधो पे बादल झुके हुए; आँखे हैं जैसे मय के पयाले भरे हुए; मस्ती है जिस में प्यार की तुम वो शराब हो।  चेहरा है जैसे झील में हंसता हुआ कंवल; या ज़िन्दगी के साज़ पे छेडी हुई ग़ज़ल; जान-ए-बहार तुम किसी शायर का ख़्वाब हो।  होंठों पे खेलती हैं तबस्सुम की बिजलियाँ; सजदे तुम्हारी राह में करती हैं कहकशा दुनिया-ए-हुस्न-ओ-इश्क का तुम ही शबाब हो। गीतकार: शकील बदायुनी; फ़िल्म: चौदहवीं का चांद (1960) गायक: मुहम्मद रफ़ी 

  • ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात; एक अंजान हसीना से मुलाकात की रात; ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी ...हाय वो रेशमी ज़ुल्फ़ों से बरसता पानी; फूल से गालों पे रुकने को तरसता पानी।  दिल में तूफ़ान उठाते हुए दिल में तूफ़ान उठाते हुए जज़बात की रात ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी … ...सुर्ख आंचल को दबाकर जो निचोड़ा उसने; दिल पे जलता हुआ एक तीर सा छोड़ा उसने।  आग पानी में लगाते हुए आग पानी में लगाते हुए हालात कि रात। ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी ...मेरे नग़्मों में जो बसती है वो तस्वीर थी वो; नौजवानी के हसीं ख़्वाब की ताबीर थी वो; आसमानों से उतर आई थी जो रात की रात।  ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी …गीतकार: साहिर लुधियानवी; फिल्म : बरसात की रात (1960) गायक: मुहम्मद रफ़ी  

  • कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है कि जैसे तुझको बनाया गया है मेरे लिए।  तू अब से पहले सितारों में बस रही थी कहीं; तुझे ज़मीं पे बुलाया गया है मेरे लिए।  कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है कि  ये बदन ये निगाहें मेरी अमानत हैं।  ये गेसुओं की घनी छाँव है मेरी खातिर; ये होंठ और ये बाहें मेरी अमानत हैं।  कि जैसे बजती हैं शहनाइयाँ सी राहों में।  सुहागरात है घूँघट उठा रहा हूँ मैं, सिमट रही है तू शरमा के अपनी बाँहों में। गीतकार: साहिर लुधियानवी; फिल्म : कभी कभी (1976) गायक: मुकेश

  • आप की आँखों में कुछ महके हुए से राज़ है; आप से भी खूबसूरत आप के अंदाज़ है।  लब हिले तो मोगरे के फूल खिलते हैं कहीं; आप की आँखों में क्या साहिल भी मिलते है कहीं; आप की खामोशियाँ भी आप की आवाज़ है। गीतकार: गुलज़ार फिल्म: घर 1978 गायक: किशोर कुमार 

अपनी स्वयं की महबूबा के लिए इस तरह के गीत गाये जाएँ  तो ठीक है।  परन्तु दिल फैंक  आशिक इन जुमलों का इस्तेमाल किसी भी  लड़की पर कर दिया करते हैं और आपने आप को शायर और कवि की श्रेणी में रखते हैं।  असल में इस तरह के गीतों को मुकेश, रफ़ी और किशोर जैसे गायकों ने इतनी खूबसूरती के साथ गाया है कि यह जनमानस के गीत बन गए हैं।  70-80 वर्ष के वरिष्ठ लोग भी महफिलों में इनको गाते गुनगुनाते रहते हैं।  एक दो पेग लगाने के बाद तो और भी मस्ती छा जाती है।   और यदा कदा इन गीतों को सुनने सुनाने के लिए ही महफिलें सजाई जाती हैं।  सोशल मीडिया पर  केरोके ने इन को और भी लोकप्रिय कर दिया है।  


इस तरह के अधिकाँश गीत नारी के भौतिक शरीर की ही उपमा किया  करते हैं।  नारी का शरीर होता ही सुन्दर है। नारी का  तन भी सुंदर है और  मन भी सुंदर और वह  सुंदरता की मूरत है।  और उस पर हार शृंगार भी खूब जचता है।  मगर इन गीतों के बदौलत  नारी का भौतिक शरीर  ना केवल  प्रशंसा का विषय  बन गया है अपितु सार्वजनिक आकर्षण का । कुछ गीत तो नारी की तरफ से ही इस तरह से गवाए गए हैं कि जैसे नारी  एक व्यक्तित्व ना हो कर कुछ बाज़ारू चीज़ हो।  उदहारण 

  • लैला मैं लैला ऐसी हूँ लैला हर को चाहे मुझसे मिलना अकेला। जिसको भी देखूं दुनियां भुला दूं मजनू बना दूं ऐसी मैं लैला हो…  गीतकार: फारुख कैसर फिल्म: कुर्बानी 1980 

  • हुस्न के लाखों रंग, कौन सा रंग देखोगे।  आग है ये बदन, कौन सा अंग देखोगे।  गालों के ये फूल गुलाबी, इनकी रंगत क्या जानो।  होंठों के दो जाम शराबी, इनकी लज़्ज़त क्या जानो।  ज़ुल्फ़ों की ये छाँव घनेरी, इनकी राहत क्या जानो।  पर्दे  में क्या छुपा हुआ है, तेरी नज़र ये क्या जाने।  इन आँखों के पीछे कितने बसे हुए हैं मैखाने।  पीके देखो जाम नज़र का  हो जाओगे दीवाने।  गीतकार: राजेंदर कृष्ण फिल्म: जानी मेरा नाम 1970 

नारी का  रूठना, इतराना, हंसना, मनाना, बोलना, चलना, देखना पुरुष के  लिए आकर्षण का विषय बना ही  रहता है। इससे जितना किसी  आशिक/महबूब का मन मचलता है उतना ही किसी  शायर का  भी। इसीलिए 'अदा' शायरी का महत्वपूर्ण  हिस्सा रहा है।   'अदा' को लेकर शायरों ने क्या क्या जुमले लिखे हैं: -   शायर कहता है कि, “चांद शर्माएगा चांदनी रात में; यूं न जुल्फों को अपनी संवारा करो; ये तबस्सुम (मुस्कान) ये आरिज़ ये रोशन जबीन; ये अदा ये निगाहें ये जुल्फें  हसीन।  आईने की नज़र लग न जाए कहीं जानेजाँ  अपना सदका उतारा  करो।  दिल तो क्या चीज है जान से जाएंगे; मौत आने से पहले ही मर जाएंगे।  ये अदा देखने वाले लुट जाएंगे यूं न हस कर दिलबर इशारा करो।”  

अपनी मेहबूबा की उपमा में शायरी करना  कोई गलत बात नहीं।  परन्तु नारी को एक भौतिक वस्तु समझ कर हर नारी के प्रति आकर्षण का भाव रखना वासना है।  सिगमंड फ्रायड ने 1899 में ‘इंटरप्रिटेशन ऑफ ड्रीम्स” में एक  अवधारणा पेश की थी   जिस को उस ने नाम दिया था: ईडिपस कॉम्प्लेक्स। इस मनोविज्ञानिक  सिद्धांत के अनुसार हर बच्चा आपने  विपरीत लिंग के माता-पिता के साथ यौन संबंध की इच्छा रखता है और समान लिंग के माता-पिता के साथ प्रतिद्वंद्विता की  भावना रखता है।  यानि  लड़के अपनी माँ की ओर  स्वाभविक तौर पर आकर्षित होते हैं और बेटी आपने पिता की तरफ।  सामान्य विकास की प्रक्रिया में  यह एक महत्वपूर्ण चरण है। ईडिपस कॉम्प्लेक्स शब्द एक ग्रीक किंवदंती के नायक ईडिपस से निकला है। उस कहानी में  ईडिपस  नाम के  नायक ने अनजाने में अपने पिता को मार डाला और अपनी माँ से शादी कर ली। 

फ्रायड ने कहा कि ईडिपस कॉम्प्लेक्स  तीन से पांच साल की उम्र तक के  बच्चों में  स्पष्ट होता है।  यह चरण आमतौर पर तब गौण  हो जाता है जब बच्चा समान लिंग के माता-पिता के साथ पहचान करता है और अपनी यौन प्रवृत्ति को दबा देता है। यौन प्रवृत्ति को दबाने से  ईगो और  सुपर ईगो नामक नैतिकता का जन्म होता है  जो चेतन वयस्क मन पर हावी हो जाती हैं।   मूल में इंसान के मन पर ईडिपस कॉम्प्लेक्स की पकड़ बनी रहती है और मानव विपरीत लिंग को पसंद करता रहता है। फ्रायड ने ईडिपस कॉम्प्लेक्स  के खिलाफ प्रतिक्रियाओं को आपनी अवधारणा की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि माना। इस अवधारणा से यह स्पष्ट है कि हर प्राणी विपरीत लिंग के प्राणी की तरफ आकर्षित रहता है।  यहाँ तक कि बहन भाई के प्यार में भी इसी ईडिपस कॉम्प्लेक्स का प्रभाव है।  


स्वाभाविक है कि प्राणी का  विपरीत लिंग की तरफ आक्रषण बना रहता है।  अगर यह आकर्षण मूल रूप  में ऐसा ही  रहे तो समाज में लोग जानवरों जैसा व्यवहार करें।  जानवर जब विपरीत लिंग के प्राणी के सानिध्य में आते हैं तो सर्वप्रथम विपरीति  लिंग के गुप्तांगों अर्थात जननिद्रियों की तरफ आकर्षित होते हैं।  मनुष्य भी ऐसे ही करता है परन्तु समाज की मर्यादा में रह कर प्रत्यक्ष नहीं करता या प्रत्यक्ष नहीं होने देता।  इसी मर्यादा अर्थात नैतिकता को सिगमंड फ्रायड ने ईगो का नाम दिया है।  जब यह ईगो संत स्वभाव या ब्रह्मचर्य में परिणित हो जाती है तो उसे सुपर ईगो कहते हैं। ईगो और सुपर ईगो  अथवा ब्रह्मचर्य विपरीत लिंग की तरफ आकर्षण को नकारता नहीं परन्तु उस के इज़हार पर अंकुश है।  मन पर बुद्धि की लगाम होती  है।  लगाम ढीली हुई नहीं कि प्राणी अपनी मूल प्रकृति के अनुसार व्यवहार करता है।  बुढ़ापे में कई लोग ठरकी हो जाते हैं।  कारण मन पर बुद्धि की पकड़ ढीली पद जाती है। इस लिए समाज को सुसंस्कृत बनाये रखने के लिए मन पर आचार की लगाम लगाना अनिवार्य है अन्यथा पशुप्रकृति हावी होती रहेगी। 



 


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Tuesday, June 7, 2016

The Gender Bias in India

Quite often it has happened with me. I am taking my walk in a park at my own speed. A lady outpaces and overtakes me. Suddenly I feel that I cannot allow this to happen. I increase my speed and feel satisfied only when I am able to overtake her. This has happened in academic and professional fields too. It is somewhere in the sub conscious mind not to get defeated by ladies. But for the past few days I feel that I am being outperformed by my wife. The following account will clarify it.

For quite sometime we have been requesting our daughter and son  to give us an opportunity of baby sitting. Luckily we became grandparents in Oct and now our daughter asked us to be with her in Singapore to assist her when she goes for a job. Myself and wife came over  to take care of Vihaan who is seven months old. This is the best job after retirement I have found. The job of Dean in a Management School that I took up after my retirement from Punjab National Bank also concluded well in time for me to be free to come to Singapore. Here I have no professional/ academic responsibility and no engagement. I am also out of touch with gossips as I have not yet activated my international  roaming on my mobile and didnot buy local number. 

So for last one month our only preoccupation is to take care of Vihaan and ourselves. But I find my wife has scored much higher marks than me in the last one month. Vihaan gets up around 8am. We have rescheduled our morning walks in such a  way that we take him with us. But before Vihaan gets up Rita is free from her morning Saadhna (Yoga+Pranayaam=45 minutes) and her cup of tea. In addition she takes charge of Vihaan from Mansi and also has to look after his ablutions which only she can do. Before we go for morning walk I miss either Saadhna or morning cup of tea which I have to make up on return. During the day my only job is to play with Vihaan. But she cooks food for all of us on all occasions and in addition all critical moments are handled by her like changing pads and making him sleep or to pacify him when he cries. She also runs the washing machine and makes sure that the clothes are dried and ironed. In addition he is most uptodate with news from friends and relatives and also gives appropriate instructions for shopping in which she accompanies me during morning or evening walk, I did some household jobs like peeling vegetables or cutting fruits & salads on a couple of occasions and feel that I have done a great job. 

Taking care of tiny toddler is a very pleasant job. We cannot leave the child alone. Each day the child grows and gives the pleasure of his love and affection. It is now only that I have realised that I missed the opportunity to see this phase of life of my son and daughter and this happened not because I was out of station or not available but because I remained unnecessarily preoccupied in by joining evening courses to do Management Diploma course. It is now only that I realise that Rita has taken care of all departments of the family life in much better fashion than me and in addition was a regular teacher in a Govt School where she was professionally very successful. 

So there is no meaning in feeling that I donot allow any woman to outpace me in morning walk. She has walked with me through  out my life but has always outperformed and outpaced. This makes me do some introspection. In the so called man dominated society it is the woman who contributes more. In the blog posts that will follow I will write cases where this is proved.